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चिरई-चुगनी

 

डॉ.अजय कुमार शुक्ल

प्राध्यापकहिन्दी

कलिंगा विश्वविद्यालय(छत्तीसगढ़)

ajay.shukla@Kalingauniversity.ac.in

 

छतीसगढ़ को देश में धान का कटोरा कहा जाता है।देश में धान के उत्पादन की दृष्टि में छतीसगढ़ का स्थान 8 वां है।यहाँ के कुल कृषि रकबे के 88 फीसदी से अधिक भाग में धान की खेती की जाती है।छत्तीसगढ़ में प्रतिवर्ष 61 मिट्रिक टन चावल का उत्पादन होता है।एक अनुमान के मुताबिक छतीसगढ़ में धान की 23 हजार से अधिक किस्मों की उपज होती है। जो विश्व का सबसे बड़ा संग्रह है।यहां अधिकतर किसान धान की खेती करते हैं।इसीलिये छत्तीसगढ़ के लोकजीवन और लोकसंस्कृति में धान का विशेष महत्व है।

 

दीपावली के समय जब धान की नयी फसल तैयार हो जाती है।तब यहाँ के किसान धान से सुनहरे फसल को देखकर गदगद हो जाते हैं।अपने जी तोड़ परिश्रम का फल प्राप्त होने से खुशी स्वाभाविक भी है।यह धान की फसल उसकी लोकसंस्कृति और लोकपरंपराओं में गहरी जुड़ी हुयी है।दरअसल छत्तीसगढ़ के अधिकांश तीज-त्योहार सीधे प्रकृति से जुड़े हुए हैं।धान की फसल तैयार होने पर उसकी खूबसूरत बालियों से अपने घर के चौखट पर लगाने की गौरवशाली परंपरा सरगुजा से लेकर बस्तर तक  विद्यमान है।सरगुजा (उत्तरी छत्तीसगढ़) में इस परंपरा को बलबंधीके नाम से तो बस्तर (दक्षिणी छत्तीसगढ़) में इसे सेलाके नाम से जाना जाता है।जबकि मध्य छत्तीसगढ़ में इसे चिरई चुगनी,फाक्ता ,पहटा,पिंजरा आदि के नाम से संबोधित किया जाता है।कुछ लोग इसे झालरनाम से भी जानते हैं।

 

धान के कटोरे छत्तीसगढ़ में दिवाली के मौके पर चिरई-चुगनी टांगने की परंपरा सदियों पुरानी है।दीवाली त्योहार के अवसर पर जब खेतों में खरीफ की नई फसल पककर तैयार हो जाती है। उस वक्त छत्तीसगढ़ के कृषकों की मान्यता है कि धान की जो पहली फसल काटी जाती है।उस धान की पकी बालियों से सुंदर झालर(चिरई-चुगनी)तैयार किया जाता हैं।जिसे अपने घर की चौखट के ऊपर लगाने से सुख,समृद्धि और वैभव आता है।छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति में धान की झालर बांधने की गौरवशाली परंपरा है।यह झालर सुंदर एवं कलात्मक दिखलाई पड़ने के साथ-साथ संपन्ननता का प्रतीक है।।ऐसी मान्यता भी है कि इन धान की बालियों से बने झालर को दरवाजों के चौखट पर सजाने से धन और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी आती हैं,घर हमेशा धन धान्य से भरा रहता है और सभी का जीवन सदैव सुखमय बना रहता है। यह अन्नपूर्णा देवी के प्रति सम्मान और आभार प्रदर्शन की भी गौरवशाली परंपरा है। छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े गांव-कस्बों में ही नहीं बल्कि बड़े शहरों में भी दीपावली के अवसर पर प्रत्येक घर में धान की बाली से बनी चिरई-चुगनीको द्वार पर सजाने की परंपरा है।

 

छत्तीसगढ़ राज्य में उत्पन्न होने वाली फ़सलों का यहाँ के लोकत्योहार और पक्षियों के भोजन के बीच में गहरा संबंध हैं।चिरई-चुगनी की परंपरा भी इसका स्पष्ट उदाहरण है।धान की पकी बालियों से घर के प्रवेश द्वार की खूबसूरती बढ़ जाती है।और इस परंपरा के पीछे पशु-पक्षियों के संरक्षण की मानवीय परंपरा भी दिखलाई पड़ती है। ऐसी मान्यता है कि इन झालरों से उनका यह आमंत्रण चिड़ियों के माध्यम से माता लक्ष्मी तक पहुंचता है।दिवाली के अवसर पर इसे घर के बाहर दरवाजे पर लटकाने के पीछे यह भावना भी अवश्य रही होगी कि भोजन की तलाश करती हुयी चिड़िया दाना चुग सकें।वर्तमान समय में बढते शहरीकरण,रेडिएशन और प्राकृतिक असंतुलन की वजह से विलुप्त हो रही गौरैया जैसी चिड़ियों और अन्य पशु-पक्षियों को दाना मिल सके।ऐसे समय में इस लोक परंपरा का विशेष महत्व बढ जाता है।

 

छत्तीसगढ़ की गौरवशाली कृषक परंपरा पर आधारित चिरई चुगनी को अपने घर की चौखट पर सजाने की रस्म के पीछे सिर्फ परंपरा ही नहीं बल्कि मानवीय भाव को प्रदर्शित करती है।यह लोकपरंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान के साथ ही  छत्तीसगढ़ के निवासियों की सरलता,स्वछंदता और कर्म के प्रति आस्था एवं सम्मान को भी व्यक्त करती है।

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